दास्तान सुन लेंगे आप की भी
के शाम अभी बाकी है
पहले लम्हा दो लम्हा
इस तनहाई को भी सुन ले ए दोस्त
गुप्तगू होती रहेगी
शमायें बुझने तलाक़
पहले कुछ शमायें इस फलक पे
रोशन तो कर लेने दे ए दोस्त
Saturday, August 1, 2009
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